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Tuesday, December 30, 2025

THE MEMORY RECALL

पातञ्जल योगसूत्र-समाधिपाद ११,१२

अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥११॥

शांकर-भाष्य

किं प्रत्ययस्य चित्तं स्मरति, आहोस्विद् विषयस्य इति। ग्राह्योपरक्तः प्रत्ययो ग्राह्यग्रहणोभयाकारं निर्भासस्तत् जातीयकं संस्कारमारभते।

स संस्कारः स्वव्यञ्जनकाञ्जनः तदाकारामेव ग्राह्यग्रहणोभयात्मिका स्मृतिं जनयति।

तत्र ग्रहणाकारपूर्वा बुद्धिः। ग्राह्याकारपूर्वा स्मृतिः। स च द्वयी भावितस्मर्तव्या चाभावितस्मर्तव्या च।

स्वप्ने भावितस्मर्तव्या। जाग्रतसमये त्वभावितस्मर्तव्येति। सर्वाः च एताः स्मृतयः--प्रमाण--विकल्प--निद्रा स्मृतीनां अनुभवात् प्रभवन्ति। सर्वा चैता वृत्तयः

सुख-दुःख-मोहात्मिकाः। 

सुख-दुःख मोहाश्च क्लेशेषु व्याख्येयाः।

(अविद्याअस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः इति क्लेशाः)

सुखानुशयी रागः।

दुःखानुशयी द्वेषः।

मोहः पुनः अविद्या इति।

एताः सर्वा वृत्तयः निरोद्धव्याः। आसां निरोधक संप्रज्ञातो वा समाधिर्भवति - असंप्रज्ञातो वेति। अभ्यासवैराज्ञाभ्यां तन्निरोधः॥१२॥

शांकर-भाष्य -

चित्तनदीनामोभयतोवाहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय च। या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा। संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा। तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिली क्रियते। विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोतः उद्घाट्यत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥

इस उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि गरुड-पुराण में जिसे वैतरणी नामक रूपकात्मक नदी की संज्ञा दी गई है, वह इस मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारयुक्त चेतना का ही  पौराणिक शैली में दिया जानेवाला एक नाम है।

गीता का प्रारंभ प्रथम अध्याय में अर्जुन को उत्पन्न हुए विषाद से होता है। यह विषाद अर्जुन की मोहित बुद्धि में उत्पन्न हुआ जिससे उसके मन में उसके आवश्यक और समुचित कर्तव्य के विषय में संशय उत्पन्न हुआ।

अंतिम अध्याय में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं - 

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादात् मयाऽच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३॥

मेेरे लिए तो वर्ष 2025 का आज का यह दिन मेरे जीवन का सर्वाधिक मूल्यवान दिन सिद्ध हो गया!!

*** 


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ujjain, m.p., India
My Prominant Translation-Works Are: 1.अहं ब्रह्मास्मि - श्री निसर्गदत्त महाराज की विश्वप्रसिद्ध महाकृति "I Am That" का हिंदी अनुवाद, चेतना प्रकाशन मुम्बई, ( www.chetana.com ) से प्रकाशित "शिक्षा क्या है ?": श्री जे.कृष्णमूर्ति कृत " J.Krishnamurti: Talks with Students" Varanasi 1954 का "ईश्वर क्या है?" : "On God", दोनों पुस्तकें राजपाल संस, कश्मीरी गेट दिल्ली से प्रकाशित । इसके अतिरिक्त श्री ए.आर. नटराजन कृत, श्री रमण महर्षि के ग्रन्थों "उपदेश-सारः" एवं "सत्‌-दर्शनं" की अंग्रेज़ी टीका का हिंदी अनुवाद, जो Ramana Maharshi Centre for Learning,Bangalore से प्रकाशित हुआ है । I love Translation work. So far I have translated : I Am That (Sri Nisargadatta Maharaj's World Renowned English/Marathi/(in more than 17 + languages of the world) ...Vedanta- Classic in Hindi. J.Krishnamurti's works, : i) Ishwar Kyaa Hai, ii)Shiksha Kya Hai ? And some other Vedant-Classics. I am writing these blogs just as a hobby. It helps improve my skills and expressing-out myself. Thanks for your visit !! Contact : vinayvaidya111@gmail.com