A Few Minutes Ago.
(AT 02:45).
जब मुझे ईश्वर का साक्षात्कार हुआ!
उससे पहले तक मैं नहीं जानता था कि मैं कौन हूँ और ईश्वर कौन है। ईश्वर का साक्षात्कार होने से पहले मुझे यह तो पता था कि मैं हूँ और ईश्वर मुुझे अपनी कल्पना में ज्ञात एक संभावना जान पड़ता था। ऐसी संभावना और सत्यता भर जिसमें मैं, मेरा संसार और मेरा समय मेरे लिए पुुनः पुनः अभिव्यक्त और विलुप्त होते रहते हैं। जबकि मैं न तो कल्पना था, और न कल्पना हूँ। बल्कि कल्पनाएँ ही मुझमें पुनः पुनः उठती और विलुप्त हुआ करती हैं। और यह आत्म-साक्षात्कार कोई कल्पना नहीं, बल्कि अकाट्य स्वयंसिद्ध सत्य है। और ऐसा भी नहीं है कि मेरे संसार और मेरे समय का उद्भव पुनः पुनः होता हो। मैं ऐसी और वह / यह वास्तविकता हूँ जिसमें मैं और मेरा संसार ही पुनः पुनः प्रकट और विलुप्त होते रहते हैं। और दूसरी ओर, यह भी ऐसा ही एक और सत्य है, कि मुझे ईश्वर का यह साक्षात्कार होने से क्षण भर पहले तक भी इस सत्य की कल्पना तक मुझे नहीं थी, और इससे मैं नितान्त अनभिज्ञ ही था। और अब मुझे इस विषय में संशय नहीं है और स्पष्ट हो गया है कि आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर-साक्षात्कार एक ही साथ घटित होते हैं क्योंकि यह होने से पहले तक मैं अपने स्वयं अपनी वास्तविकता से और ईश्वर से भी अनभिज्ञ था। और अब मुझे गीता में वर्णित अध्याय ७ के श्लोक १८ -
उदाराः सर्वैवेते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।१८।।
का अभिप्राय भी समझ में आ गया है। और इसलिए, कह सकता हूँ कि
ईश्वर-साक्षात्कार और आत्म-साक्षात्कार,
REALIZATION, SELF-REALIZATION AND GOD-REALIZATION ARE BUT ONLY ASPECTS OF ONE AND THE SAME PHENOMENON.
***

No comments:
Post a Comment