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Tuesday, December 30, 2025

After death.

What happens after death?

वैतरणी

2015 में गरुड-पुराण पढ़ने का अवसर मिला। इससे पहले स्वामी दयानंद सरस्वती लिखित सत्यार्थ प्रकाश वर्ष 1968 में पढ़ा था। उस समय मेरी आयु 15-16 वर्ष की थी। सत्यार्थ प्रकाश पुुस्तक में प्रयुक्त हिन्दी भाषा की शैली भी कुछ कुछ अलग जान पड़ती थी। इसलिए तब मुझे पुराणों की सत्यता पर संदेह होने लगा था। किन्तु मैंने निश्चय किया कि पुराणों का अध्ययन ठीक से किए बिना उन पर अविश्वास भी नहीं करूँगा। चूँकि बचपन से ही अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर ध्यान के कुछ ऐसे प्रयोग करता रहा था जिनसे मुझे आसानी से यह समझ में आ जाता था कि मुझे हो रहा कोई अनुभव मेरे मन की जाग्रत दशा में घटित हो रहा है या मेरे मन के स्वप्न की दशा में। और बाद में जब मुझे मेरे मन की कुछ ऐसी दशाओं अर्थात् चित्त की ऐसी स्थितियों के बारे में पता चला जिन्हें मैं न तो जाग्रत, न निद्रा और न ही स्वप्न कह सकता था तो मुझे यह समझ में आया और इस पर दृढ विश्वास भी हो गया कि मन अर्थात् चित्त की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओं से भिन्न एक ऐसी अवस्था भी हो सकती है जब वह चेेतना के किन्हीं ऐसे तलों पर गतिशील हो सकता है जिन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थों में विभिन्न लोकों का नाम दिया गया है। इस प्रकार के मेरे ज्ञान का आधार यह था कि अपनी जाग्रत दशा में यद्यपि मैं विभिन्न स्थितियों का मूल्यांकन तो कर सकता था किन्त केवल कल्पना करने या सोचने से उन्हें बदल नहीं सकता धा। दूसरी ओर अपने मन या चित्त के स्वप्न की दशा में मैं स्वप्न में हो रहे विभिन्न अनुभवों को अपनी कल्पना या विचार के अनुसार तत्काल ही प्रभावित कर लिया करता था। इसलिए ध्यान में या जाग्रत अवस्था में न होने पर, निद्रा में, या स्वप्न की अवस्था में भी न होने पर जब जाग्रत से मिलती जुलती एक ऐसी अवस्था का अनुभव मुझे होता जिसे कि मैं अपनी कल्पना या विचार से प्रभावित नहीं कर पाता था तो तत्काल ही समझ में आ जाता था कि यह इस अनुभवगम्य संसार से भिन्न प्रकार का कोई और ऐसा लोक है। और चूँकि ऐसी दशा के अनेक अनुभवों में मुझे मेरे जैसी अनेक "आत्माओं" से मिलने का अवसर भी मिला जिनमें से कुछ को दिव्य, कुछ को पुण्यात्मा, कुछ को शुुभ या अशुभ, साधारण या सामान्य कहा जा सकता है। यूँ तो अनेेक बार ध्यान की गहरी अवस्थाओं में मैंने स्वयं अपने आपको वृक्ष, चट्टान, पशु, पक्षी या वायवीय आकृति में की तरह भी अनुभव किया है, इसलिए इस बारे में मुझे संदेह न रहा कि ऐसे अनेक सहवर्ती संसार भी अवश्य अस्तित्व में हैं। अनेक बार कुछ दिवंगत आत्माओं से भी मेेरा संपर्क होता रहा है। यह सब वैसा ही पूर्वनियोजित है जैसा हम अपने इस संसार में देखते हैं। 1984 के आसपास पुपुल जयकर द्वारा लिखित जे. कृष्णमूर्ति की biography  में पढ़ा कि किस प्रकार स्वर्गीय इंदिरा गांधी के बारे में पुपुल जयकर के द्वारा कुछ पूछे जाने पर उनसे जे. कृष्णमूर्ति ने कहा था कि मृत मनुष्यों के बारे में कुछ नहीं सोचना चाहिए। संंभवतः इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ऐसा करने पर वे हमारी ओर आकर्षित हो सकते हैं, जबकि उनके लिए यही अधिक अच्छा होगा कि वे इस लोक को भूल कर अपनी यात्रा पर आगे निकल जाएँ। उन्हें स्मरण करते रहना उनके लिए शोक करना सर्वथा अनुचित है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही शिक्षा दी थी -

अशोच्यानन्शोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।

गीता में एक ओर तो मनुष्य का अंतिम समय आने पर उसकी आत्मा कौन सी गति को प्राप्त करती है, इसका वर्णन है तो दूसरी ओर आत्मा की अविनाशिता का भी वर्णन है। स्पष्ट है कि ज्ञानियों, योगियों और ईश्वर के उन भक्तों तथा दूसरे लोगों की अंतिम अवस्था की मानसिक स्थिति भिन्न होने के ही कारण मृत्यु के बाद वे भिन्न भिन्न गतियों को प्राप्त करते हैं। देवताओ की पूजा उपासना करनेवाले देवताओं (के लोक) को, पितरों, यक्ष-राक्षसों की पूजा उपासना करनेवाले उन उन लोकों को प्राप्त होते हैं,जबकि मुुझे अपने आपसे अभिन्न और अनन्य की तरह मेरी भक्ति करनेवाले मुझ परमात्मा को ही -

मामैव उपेति मद्भक्तः ...

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

गरुड-पुराण और वैतरणी

गरुड-पुराण में वर्णित वैतरणी के उल्लेख की तब तक मैं उपेक्षा ही करता रहा जब तक एक रात्रि में मुझे अपने ही साथ स्वप्न जैसी अवस्था में इसका अनुभव नहीं हो गया।उस समतल दूर दूर तक फैली भूमि क विस्तार में मैंने वह नदी देखी। मेरे लिए उसका जल एक पतली परत ही था, और उस नदी की चौड़ाई मेेरे लिए सौ पचास कदम की थी, किन्तु मैं उसे पार करने से डर भी रहा था। मुझे लग रहा धा कि मेरी मृत्यु हो चुकी है और अब यहाँ यमलोक के मार्ग पर मुझे आगे जाना है। वहाँ पर एक नाव भी थी जिस पर एक नाविक भी बैठा था। मैं रो रहा था और वह मुुझ पर हँसता हुआ मुझे देख रहा था। तब एकाएक मुझे ध्यान आया कि मैंने यज्ञोपवीत नहीं पहना था शायद वह  इसलिए मुझ पर हँस रहा था। और मुझे संदेह नहीं था कि वह न तो मेरा स्वप्न था, न जाग्रत अवस्था थी।

अभी दो चार दिन पहले arcane channel पर यही वर्णन सुना तो मैं चौंक गया!

आज सुबह "स्मृति" के बारे में सोच रहा था, तो पातञ्जल योगसूत्र - ११, १२ समाधिपाद शाङ्करभाष्य

में उस उभयवती नदी का वर्णन पढ़ने को मिला, जिसके बारे में अगले पोस्ट में लिखने का विचार है।

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ujjain, m.p., India
My Prominant Translation-Works Are: 1.अहं ब्रह्मास्मि - श्री निसर्गदत्त महाराज की विश्वप्रसिद्ध महाकृति "I Am That" का हिंदी अनुवाद, चेतना प्रकाशन मुम्बई, ( www.chetana.com ) से प्रकाशित "शिक्षा क्या है ?": श्री जे.कृष्णमूर्ति कृत " J.Krishnamurti: Talks with Students" Varanasi 1954 का "ईश्वर क्या है?" : "On God", दोनों पुस्तकें राजपाल संस, कश्मीरी गेट दिल्ली से प्रकाशित । इसके अतिरिक्त श्री ए.आर. नटराजन कृत, श्री रमण महर्षि के ग्रन्थों "उपदेश-सारः" एवं "सत्‌-दर्शनं" की अंग्रेज़ी टीका का हिंदी अनुवाद, जो Ramana Maharshi Centre for Learning,Bangalore से प्रकाशित हुआ है । I love Translation work. So far I have translated : I Am That (Sri Nisargadatta Maharaj's World Renowned English/Marathi/(in more than 17 + languages of the world) ...Vedanta- Classic in Hindi. J.Krishnamurti's works, : i) Ishwar Kyaa Hai, ii)Shiksha Kya Hai ? And some other Vedant-Classics. I am writing these blogs just as a hobby. It helps improve my skills and expressing-out myself. Thanks for your visit !! Contact : vinayvaidya111@gmail.com