कविता
दूर नहीं, जल्दी ही!
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वह समय होगा जब,
सभी संपर्क, संबंध और
यहाँ तक कि पहचान भी,
बेमानी होकर रह जाएगी,
दूसरों की, लोगों की भी,
और खुद अपने आपकी भी!
सब कुछ पहचान से परे होगा।
अतीत और भविष्य ही नहीं,
बल्कि वह वर्तमान भी,
जिसे समय कहा जाता है,
और जो कभी क्षणिक तो,
कभी बहुत लंबा जान पड़ता है,
यहाँ तक कि मानों ठहर गया हो!
पर तब घबराहट भी नहीं होगी,
तब यह तक पता न चलेगा कि,
साँस चल भी रही है या नहीं,
शायद तब बहुत चैन महसूस हो,
या बस एक मौन निस्तब्धता भर।
और शायद भूख, प्यास, नींद,
चिन्ता, कमजोरी और शायद
डर भी, साथ छोड़ दे!
तब शायद तुम्हारे आसपास के लोग,
घबरा जाएँ, डर जाएँ या,
बस प्रतीक्षा करने लगें,
डाॅॅक्टर या एम्बुलेंस की,
शायद तुम गुजार सको,
और कुछ ऐसा समय,
जो दूर नहीं बल्कि,
तुम्हारे पास ही खड़ा हो!
और फिर कुछ खास नहीं होगा!
जल्दी ही तुम दूर हो जाओगे,
लोगों की और अपने आपकी भी,
स्मृति और पहचान से परे!
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