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Tuesday, December 30, 2025

THE MEMORY RECALL

पातञ्जल योगसूत्र-समाधिपाद ११,१२

अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥११॥

शांकर-भाष्य

किं प्रत्ययस्य चित्तं स्मरति, आहोस्विद् विषयस्य इति। ग्राह्योपरक्तः प्रत्ययो ग्राह्यग्रहणोभयाकारं निर्भासस्तत् जातीयकं संस्कारमारभते।

स संस्कारः स्वव्यञ्जनकाञ्जनः तदाकारामेव ग्राह्यग्रहणोभयात्मिका स्मृतिं जनयति।

तत्र ग्रहणाकारपूर्वा बुद्धिः। ग्राह्याकारपूर्वा स्मृतिः। स च द्वयी भावितस्मर्तव्या चाभावितस्मर्तव्या च।

स्वप्ने भावितस्मर्तव्या। जाग्रतसमये त्वभावितस्मर्तव्येति। सर्वाः च एताः स्मृतयः--प्रमाण--विकल्प--निद्रा स्मृतीनां अनुभवात् प्रभवन्ति। सर्वा चैता वृत्तयः

सुख-दुःख-मोहात्मिकाः। 

सुख-दुःख मोहाश्च क्लेशेषु व्याख्येयाः।

(अविद्याअस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः इति क्लेशाः)

सुखानुशयी रागः।

दुःखानुशयी द्वेषः।

मोहः पुनः अविद्या इति।

एताः सर्वा वृत्तयः निरोद्धव्याः। आसां निरोधक संप्रज्ञातो वा समाधिर्भवति - असंप्रज्ञातो वेति। अभ्यासवैराज्ञाभ्यां तन्निरोधः॥१२॥

शांकर-भाष्य -

चित्तनदीनामोभयतोवाहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय च। या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा। संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा। तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिली क्रियते। विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोतः उद्घाट्यत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥

इस उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि गरुड-पुराण में जिसे वैतरणी नामक रूपकात्मक नदी की संज्ञा दी गई है, वह इस मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारयुक्त चेतना का ही  पौराणिक शैली में दिया जानेवाला एक नाम है।

गीता का प्रारंभ प्रथम अध्याय में अर्जुन को उत्पन्न हुए विषाद से होता है। यह विषाद अर्जुन की मोहित बुद्धि में उत्पन्न हुआ जिससे उसके मन में उसके आवश्यक और समुचित कर्तव्य के विषय में संशय उत्पन्न हुआ।

अंतिम अध्याय में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं - 

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादात् मयाऽच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३॥

मेेरे लिए तो वर्ष 2025 का आज का यह दिन मेरे जीवन का सर्वाधिक मूल्यवान दिन सिद्ध हो गया!!

*** 


After death.

What happens after death?

वैतरणी

2015 में गरुड-पुराण पढ़ने का अवसर मिला। इससे पहले स्वामी दयानंद सरस्वती लिखित सत्यार्थ प्रकाश वर्ष 1968 में पढ़ा था। उस समय मेरी आयु 15-16 वर्ष की थी। सत्यार्थ प्रकाश पुुस्तक में प्रयुक्त हिन्दी भाषा की शैली भी कुछ कुछ अलग जान पड़ती थी। इसलिए तब मुझे पुराणों की सत्यता पर संदेह होने लगा था। किन्तु मैंने निश्चय किया कि पुराणों का अध्ययन ठीक से किए बिना उन पर अविश्वास भी नहीं करूँगा। चूँकि बचपन से ही अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर ध्यान के कुछ ऐसे प्रयोग करता रहा था जिनसे मुझे आसानी से यह समझ में आ जाता था कि मुझे हो रहा कोई अनुभव मेरे मन की जाग्रत दशा में घटित हो रहा है या मेरे मन के स्वप्न की दशा में। और बाद में जब मुझे मेरे मन की कुछ ऐसी दशाओं अर्थात् चित्त की ऐसी स्थितियों के बारे में पता चला जिन्हें मैं न तो जाग्रत, न निद्रा और न ही स्वप्न कह सकता था तो मुझे यह समझ में आया और इस पर दृढ विश्वास भी हो गया कि मन अर्थात् चित्त की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओं से भिन्न एक ऐसी अवस्था भी हो सकती है जब वह चेेतना के किन्हीं ऐसे तलों पर गतिशील हो सकता है जिन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थों में विभिन्न लोकों का नाम दिया गया है। इस प्रकार के मेरे ज्ञान का आधार यह था कि अपनी जाग्रत दशा में यद्यपि मैं विभिन्न स्थितियों का मूल्यांकन तो कर सकता था किन्त केवल कल्पना करने या सोचने से उन्हें बदल नहीं सकता धा। दूसरी ओर अपने मन या चित्त के स्वप्न की दशा में मैं स्वप्न में हो रहे विभिन्न अनुभवों को अपनी कल्पना या विचार के अनुसार तत्काल ही प्रभावित कर लिया करता था। इसलिए ध्यान में या जाग्रत अवस्था में न होने पर, निद्रा में, या स्वप्न की अवस्था में भी न होने पर जब जाग्रत से मिलती जुलती एक ऐसी अवस्था का अनुभव मुझे होता जिसे कि मैं अपनी कल्पना या विचार से प्रभावित नहीं कर पाता था तो तत्काल ही समझ में आ जाता था कि यह इस अनुभवगम्य संसार से भिन्न प्रकार का कोई और ऐसा लोक है। और चूँकि ऐसी दशा के अनेक अनुभवों में मुझे मेरे जैसी अनेक "आत्माओं" से मिलने का अवसर भी मिला जिनमें से कुछ को दिव्य, कुछ को पुण्यात्मा, कुछ को शुुभ या अशुभ, साधारण या सामान्य कहा जा सकता है। यूँ तो अनेेक बार ध्यान की गहरी अवस्थाओं में मैंने स्वयं अपने आपको वृक्ष, चट्टान, पशु, पक्षी या वायवीय आकृति में की तरह भी अनुभव किया है, इसलिए इस बारे में मुझे संदेह न रहा कि ऐसे अनेक सहवर्ती संसार भी अवश्य अस्तित्व में हैं। अनेक बार कुछ दिवंगत आत्माओं से भी मेेरा संपर्क होता रहा है। यह सब वैसा ही पूर्वनियोजित है जैसा हम अपने इस संसार में देखते हैं। 1984 के आसपास पुपुल जयकर द्वारा लिखित जे. कृष्णमूर्ति की biography  में पढ़ा कि किस प्रकार स्वर्गीय इंदिरा गांधी के बारे में पुपुल जयकर के द्वारा कुछ पूछे जाने पर उनसे जे. कृष्णमूर्ति ने कहा था कि मृत मनुष्यों के बारे में कुछ नहीं सोचना चाहिए। संंभवतः इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ऐसा करने पर वे हमारी ओर आकर्षित हो सकते हैं, जबकि उनके लिए यही अधिक अच्छा होगा कि वे इस लोक को भूल कर अपनी यात्रा पर आगे निकल जाएँ। उन्हें स्मरण करते रहना उनके लिए शोक करना सर्वथा अनुचित है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही शिक्षा दी थी -

अशोच्यानन्शोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।

गीता में एक ओर तो मनुष्य का अंतिम समय आने पर उसकी आत्मा कौन सी गति को प्राप्त करती है, इसका वर्णन है तो दूसरी ओर आत्मा की अविनाशिता का भी वर्णन है। स्पष्ट है कि ज्ञानियों, योगियों और ईश्वर के उन भक्तों तथा दूसरे लोगों की अंतिम अवस्था की मानसिक स्थिति भिन्न होने के ही कारण मृत्यु के बाद वे भिन्न भिन्न गतियों को प्राप्त करते हैं। देवताओ की पूजा उपासना करनेवाले देवताओं (के लोक) को, पितरों, यक्ष-राक्षसों की पूजा उपासना करनेवाले उन उन लोकों को प्राप्त होते हैं,जबकि मुुझे अपने आपसे अभिन्न और अनन्य की तरह मेरी भक्ति करनेवाले मुझ परमात्मा को ही -

मामैव उपेति मद्भक्तः ...

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

गरुड-पुराण और वैतरणी

गरुड-पुराण में वर्णित वैतरणी के उल्लेख की तब तक मैं उपेक्षा ही करता रहा जब तक एक रात्रि में मुझे अपने ही साथ स्वप्न जैसी अवस्था में इसका अनुभव नहीं हो गया।उस समतल दूर दूर तक फैली भूमि क विस्तार में मैंने वह नदी देखी। मेरे लिए उसका जल एक पतली परत ही था, और उस नदी की चौड़ाई मेेरे लिए सौ पचास कदम की थी, किन्तु मैं उसे पार करने से डर भी रहा था। मुझे लग रहा धा कि मेरी मृत्यु हो चुकी है और अब यहाँ यमलोक के मार्ग पर मुझे आगे जाना है। वहाँ पर एक नाव भी थी जिस पर एक नाविक भी बैठा था। मैं रो रहा था और वह मुुझ पर हँसता हुआ मुझे देख रहा था। तब एकाएक मुझे ध्यान आया कि मैंने यज्ञोपवीत नहीं पहना था शायद वह  इसलिए मुझ पर हँस रहा था। और मुझे संदेह नहीं था कि वह न तो मेरा स्वप्न था, न जाग्रत अवस्था थी।

अभी दो चार दिन पहले arcane channel पर यही वर्णन सुना तो मैं चौंक गया!

आज सुबह "स्मृति" के बारे में सोच रहा था, तो पातञ्जल योगसूत्र - ११, १२ समाधिपाद शाङ्करभाष्य

में उस उभयवती नदी का वर्णन पढ़ने को मिला, जिसके बारे में अगले पोस्ट में लिखने का विचार है।

***






Sunday, December 28, 2025

LIFE, LIQUIDITY VOLATILITY.

कविता

दूर नहीं, जल्दी ही!

--

वह समय होगा जब,

सभी संपर्क, संबंध और

यहाँ तक कि पहचान भी,

बेमानी होकर रह जाएगी,

दूसरों की, लोगों की भी,

और खुद अपने आपकी भी!

सब कुछ पहचान से परे होगा।

अतीत और भविष्य ही नहीं,

बल्कि वह वर्तमान भी,

जिसे समय कहा जाता है,

और जो कभी क्षणिक तो,

कभी बहुत लंबा जान पड़ता है,

यहाँ तक कि मानों ठहर गया हो!

पर तब घबराहट भी नहीं होगी,

तब यह तक पता न चलेगा कि,

साँस चल भी रही है या नहीं,

शायद तब बहुत चैन महसूस हो,

या बस एक मौन निस्तब्धता भर।

और शायद भूख, प्यास, नींद,

चिन्ता, कमजोरी और शायद

डर भी, साथ छोड़ दे!

तब शायद तुम्हारे आसपास के लोग,

घबरा जाएँ, डर जाएँ या,

बस प्रतीक्षा करने लगें,

डाॅॅक्टर या एम्बुलेंस की,

शायद तुम गुजार सको,

और कुछ ऐसा समय,

जो दूर नहीं बल्कि,

तुम्हारे पास ही खड़ा हो!

और फिर कुछ खास नहीं होगा!

जल्दी ही तुम दूर हो जाओगे,

लोगों की और अपने आपकी भी,

स्मृति और पहचान से परे!

***





 

Realization and Revelation.

A Few Minutes Ago.

(AT 02:45).

जब मुझे ईश्वर का साक्षात्कार हुआ!

उससे पहले तक मैं नहीं जानता था कि मैं कौन हूँ और ईश्वर कौन है। ईश्वर का साक्षात्कार होने से पहले मुझे यह तो पता था कि मैं हूँ और ईश्वर मुुझे अपनी कल्पना में ज्ञात एक संभावना जान पड़ता था। ऐसी संभावना और सत्यता भर जिसमें मैं, मेरा संसार और मेरा समय मेरे लिए पुुनः पुनः अभिव्यक्त और विलुप्त होते रहते हैं। जबकि मैं न तो कल्पना था, और न कल्पना हूँ। बल्कि कल्पनाएँ ही मुझमें पुनः पुनः उठती और विलुप्त हुआ करती हैं। और यह आत्म-साक्षात्कार कोई कल्पना नहीं, बल्कि अकाट्य स्वयंसिद्ध सत्य है। और ऐसा भी नहीं है कि मेरे संसार और मेरे समय का उद्भव पुनः पुनः होता हो। मैं ऐसी और वह / यह वास्तविकता हूँ जिसमें मैं और मेरा संसार ही पुनः पुनः प्रकट और विलुप्त होते रहते हैं। और दूसरी ओर, यह भी ऐसा ही एक और सत्य है, कि मुझे ईश्वर का यह साक्षात्कार होने से क्षण भर पहले तक भी इस सत्य की कल्पना तक मुझे नहीं थी, और इससे मैं नितान्त अनभिज्ञ ही था। और अब मुझे इस विषय में संशय नहीं है और स्पष्ट हो गया है कि आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर-साक्षात्कार एक ही साथ घटित होते हैं क्योंकि यह होने से पहले तक मैं अपने स्वयं अपनी वास्तविकता से और ईश्वर से भी अनभिज्ञ था। और अब मुझे गीता में वर्णित अध्याय ७ के श्लोक १८ -

उदाराः सर्वैवेते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।

आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।१८।।

का अभिप्राय भी समझ में आ गया है। और इसलिए, कह सकता हूँ कि 

ईश्वर-साक्षात्कार और आत्म-साक्षात्कार,

REALIZATION, SELF-REALIZATION AND GOD-REALIZATION ARE BUT ONLY ASPECTS OF ONE AND THE SAME PHENOMENON.

***


Saturday, December 20, 2025

THE PERCEPTION.

RECOGNITION, IDENTITY and IDENTIFICATION.

--

In The Awareness of being, arises the consciousness where you are conscious only and the identity of being yourself and the quality of the knowing persists without identifying oneself as the one who is conscious. One identifies oneself neither as the object nor as the subject. Even then, soon from this state, the mind arises and conscousness splits itself as an object perceived and the assumed self that appears asthe one who perceives. From here proceeds the thought, and the thought reflects in the consciousness as the assumed Thinker.

Likewise about the experience.

In experiencing, there is the experience alongwith its reflection in consciousness which assumes the momentary notion of  being oneself the supposed one who then is called and believed to be different and independent of the activ8ty of thinking and the tought too.

This is how everyone is carried away in the thought and thinking. However when one looks attentively with due patience, this whole thing is seen as a joke only. Having even once understood this joke, one never falls a pray to it, so long and as much as and until one is interested.

In-attention and distraction are the only two components of the self-ignorance. The self is like the camphor when burnt down reduces to Light of Awareness of The Self whether you call it by this name or by any other name or say that this is Nameless!

--

Nurseryrhymesforthegrownups. 

***

  

Monday, December 15, 2025

Sensitivity.

Sensitivity is the attribute of perception in consciousness.

All Consciousness implies Duality - The Perceived and the one who perceives.

The One who perceives is the conscious, the subject of perception, while the perceived is the object that is perceived in consciousness. Sensitivity varies from a numerical measure of zero (0) to Total / Whole, which as perfect could be one (1). Then The Ultimate Sensitivity is the brahman /  ब्रह्मन्  Who is non-differential, devoid of the 3 kinds of differentiability applicable to all and every individual object or subject in the Existence.

Now we can define the

Sensibility Index as the ratio :

(As The measure of) Sense / (As The measure of)  Sensitivity, within the limits (i.e. between 0 and 1.

Between The Brahman and The world is supposed a conscious entity that could be named -

God or the Individual.

God is supposed to possess infinite Power, while the individual has infinitesimaly a very small part of Power in comparison to God.

The inert matter and the World has zero. It just follows the dictates of God only. The individual on the other hand has only a small fraction of Power and sensitivity both.

Individual is subject to death but the God is the one who dictates life and the  death both of the one and all the individuals.

Sensitivity and Sensibility.

First of all, let me say what I mean by Sensitivity and Sensibility and how I distinguish the two. Sensitivity is the core nature. Sensibility is the general character of any organism.

Accordingly the sensibilities of different species have core nature which can be said to be a significant feature of that of any organism. Sensitivity is common in all living beings, say organisms but the Sensibility may differ from one another.

Thus birds have a kind of Sensibility that differs from the Sensibility of humans or other animals, plants and fish etc.

Again, though the Sensitivity remains the same, while the Sensibility develops and in general, goes through three stages of the life of the organism -

Namely the child, the adolescence and the adult. Like the hunger, the thirst, the sleep the sex-urge and drive too keeps on diminishing after a certain age in the life, according to the nature of the particular species. 

Civilization and Society 

We can say that Man is a social animal, somewhat like other animals who live in a ...

(To be continued in the next part.)

***




The Counter-Effect.

What Back-fired!

In the year 2009, I got the opportunity to use internet. At that time, I had two major reasons behind it. One, to learn about the internet modalities / protocol and to connect with people who might be interested in the Sanatana (Dharma) and the Spiritual aspects / doctrines of the Sanatana (Dharma) and the great  scriptures like उपनिषद, गीता , पुराण, महाभारत, वाल्मीकि रामायण, the 6 दर्शन of the Sanatans Oriental stream and the three modern Spiritual Heavyweights like Sri Ramana Maharshi, Sri Nisargadatta Maharaj and Sri J.Krishnsmurti.

With this point in mind I had joined the  Facebook, Twitter and blogging on the WordPress, e-blogger and a few other social networking sites.

I also had a big chunk of the people who knew me through other direct / indirect connections, Like the mutual friends.

But I was a bit disappointed to see that most of them were not really interested in the Spirituality as is taught / learned in the Sanatana (Dharma) or the great scriptures or the people like Sri Ramana Maharshi, Sri Nisargadatta Maharaj or Sri J.Krishnamurti, instead they wanted and tried to pull me into their own field of influence. So I had to withdraw myself from them. I think I have nothing more in keeping connected with them.

As a matter of fact, I hardly connect with anyone emotionally or with / through a any common mission - religious, ideal or ideological.

Neither in the religious matters, nor in the political / social.

I am of the view that the Religion is a matter of what the individual practices, while the Spiritual is about the enquiry, a matter of exploration and finding out about the truth of the world, self / Self and what one means by the God.

Thanks to internet for all the help and the support I could have from it so far.

***  

Tuesday, December 9, 2025

Sensibility Index.

संवेदन प्रवणता और संवादगम्यता 

Communication Patterns.

--

किसी भी प्रकार का सार्थक और सुचारु संवाद संंभव होने के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है -

1. कार्य क्षेत्र 

2. योग्यता क्षेत्र 

3. अधिकार क्षेत्र 

4. माध्यम

5. संवेदन प्रवणता

6. संवादगम्यता

7. परिस्थितियाँ, स्थान और समय

अपने अपने कार्य क्षेत्र में हर व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा कम या अधिक दक्ष, कुशल हो सकता है,  इसी प्रकार से उसकी उस क्षेत्र की जानकारी / योग्यता  भी किसी दूसरे व्यक्ति की तुलना में कम या अधिक हो सकती है।

अगला महत्वपूर्ण बिन्दु है माध्यम जो कि भाषा, संस्कृति और सामाजिक शिष्टाचार पर निर्भर होता है। उदाहरण के लिए किसी साहित्यिक रचना का पठन पाठन करते समय जैसी संवादप्रवणता तथा संवादगम्यता अपेक्षित होती है वह उससे बिल्कुल भिन्न तरह की होती है जैसी विज्ञान, गणित, संगीत या तकनीकी विषय का अध्ययन करने हेतु आवश्यक हो सकती है।

अंतिम बिन्दु है - परिस्थितियाँ, स्थान और समय।

किसी से जुड़ने के लिए प्रायः इनमें से एक या अधिक बिन्दु महत्वपूर्ण होते हैं। जैसे किसी संगीतबद्ध रचना को समझ पाने के लिए भिन्न भिन्न तरह से उससे जुड़ पाना होता है। कोई नर्तक या नर्तकी केवल ताल से भी जुड़ाव अनुभव कर थिरकने लग सकते हैं और उन्हें उस रचना के साहित्यिक मूल्य से फिर भी बिल्कुल ही अनभिज्ञ भी हो सकते हैं। दूसरी ओर साहित्यिक रुचि से संपन्न कोई व्यक्ति उसके संगीत पक्ष आदि के बारे में विस्तार से न समझ पाता हो। यह भी हो सकता है कि किसी तीसरे व्यक्ति को भाषा और संगीत दोनों ही अटपटे या अजीब लग रहे हों।

वस्तुओं, व्यक्तियों, विषयों, विचारों आदि से जुड़ना या न जुड़ पाना बहुत हद तक चेतन और अवचेतन स्मृति पर भी निर्भर करता है, मानसिक कल्पित, और अनुभवगत रुचियों, अरुचियों, भयों आदि पर भी।

शायद इन्हीं सब कारणों से एक समय ऐसा भी आता है जब हम न तो किसी व्यक्ति से, न किसी विचार, आदर्श, विषय, कर्म या लक्ष्य से ही जुड़ पाते हैं और हमें केेवल एक खालीपन कचोटता रहता है। तब हम अपने आपको उस खालीपन के अनुभवकर्ता की तरह identify कर लेते हैं। और कोई कभी हमें यह नहीं बतलाता कि जैसे अनुभव मन की वृत्ति है, वैसे ही अनुभवकर्ता भी मन की वृत्ति ही है। और जब हमारा ध्यान इस सच्चाई पर जाता है, तब इस सूत्रों -

तथा दृष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र।।

पर अकस्मात् हमारा ध्यान जा सकता है।

*** 




Sunday, November 23, 2025

Every New Moment.

The Creator.

P O E T R Y

--

Every New Moment,

Is the Beginning of the End,

You can neither stop,

Nor you could amend. 

Every New Beginning,

Is but a thought, 

You can neither stop,

Nor you could bend. 

Every Thought appears,

Giving way to the Next,

Every Thought disappears,

Giving way to the rest. 

The process goes on indefinitely,

From this to the next moment,

Neither has a beginning,

Neither has an end.

The illusion goes on and on,

Life continues as a dream,

Like a montage play of pictures, 

One who Creats, watches too,

As the show keeps on going, 

Still aloof and  unconcerned,

Time and Space ever so the same, 

Time and Space ever so different!

*** 


Thursday, October 23, 2025

One Can Only Pray!

P O E T R Y

--

Nothing to See,

Nothing to Say,

Either in the Night,

Or in the Day,

The Sky is brown,

The Earth is Gray,

Nowhere is Seen,

The Light of Hope,

Nowhere is Seen,

The Hope of  The Ray!

We have to go on,

Like this to Pray,

Wait and Watch,

Come What May!

***



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ujjain, m.p., India
My Prominant Translation-Works Are: 1.अहं ब्रह्मास्मि - श्री निसर्गदत्त महाराज की विश्वप्रसिद्ध महाकृति "I Am That" का हिंदी अनुवाद, चेतना प्रकाशन मुम्बई, ( www.chetana.com ) से प्रकाशित "शिक्षा क्या है ?": श्री जे.कृष्णमूर्ति कृत " J.Krishnamurti: Talks with Students" Varanasi 1954 का "ईश्वर क्या है?" : "On God", दोनों पुस्तकें राजपाल संस, कश्मीरी गेट दिल्ली से प्रकाशित । इसके अतिरिक्त श्री ए.आर. नटराजन कृत, श्री रमण महर्षि के ग्रन्थों "उपदेश-सारः" एवं "सत्‌-दर्शनं" की अंग्रेज़ी टीका का हिंदी अनुवाद, जो Ramana Maharshi Centre for Learning,Bangalore से प्रकाशित हुआ है । I love Translation work. So far I have translated : I Am That (Sri Nisargadatta Maharaj's World Renowned English/Marathi/(in more than 17 + languages of the world) ...Vedanta- Classic in Hindi. J.Krishnamurti's works, : i) Ishwar Kyaa Hai, ii)Shiksha Kya Hai ? And some other Vedant-Classics. I am writing these blogs just as a hobby. It helps improve my skills and expressing-out myself. Thanks for your visit !! Contact : vinayvaidya111@gmail.com