BUT ABSOLUTELY TRUE!
एक व्यावहारिक सत्य!
अभी 02:55 पर नींद टूटी और विचार आया कि वास्तव में पूरी तरह से आध्यात्मिक हो पाने के लिए लौकिक रूप से किन्हीं अंशों में अपूर्ण रह जाना अपरिहार्य और स्वाभाविक ही है, क्योंकि किसी के भी लिए लौकिक दृष्टि से पूर्ण हो पाना कभी संभव ही नहीं है। संसारिक दृष्टि से कोई भी मनुष्य किसी दूसरे से कम या अधिक ज्ञानी नहीं हो सकता और सफल होने या असफल होने के पूरी तरह से कोई भी सुनिश्चित और ज्ञात कारण और नियम नहीं हो सकते। आवश्यक नहीं कि पूरी तरह से आत्मज्ञानसंपन्न कोई व्यक्ति सांसारिक ज्ञान की दृष्टि से किसी भी दूसरे व्यक्ति से अधिक या कम सफल हो। अध्यात्म के क्षेत्र में स्पर्धा के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता और सांसारिक सतह पर स्पर्धा से सदैव बचे रह पाना किसी आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए भी कभी संभव नहीं है। सांसारिक समस्याओं और प्रश्नों का ऐसा कोई अंतिम और निर्णायक हल या समाधान कभी भी नहीं हो सकता, जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन में न तो कभी कोई समस्या ही होती है और न ही कुछ कोई प्रश्न हो सकता है।
और कोई भी तथाकथित
"वैज्ञानिक सत्य"
व्यावहारिक रूप से कितना भी सत्य क्यों न प्रतीत होता हो, आत्यंतिक रूप से न तो अंतिम और पूर्ण सत्य हो सकता है, और न उसका अस्तित्व हो सकता है।
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Good Bye!!
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